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हमको छोड़ सबसे बात कर रहा भारत: नेपाल

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काठमांडू
भारत के साथ सीमा विवाद मुद्दे को भड़काने के बाद नेपाल अब नया पैंतरा चल रहा है। नेपाली विदेश मंत्री प्रदीप कुमार ज्ञावली ने मीडिया ब्रीफिंग में आरोप लगाया कि कोरोना काल में भारत अमेरिका ऑस्ट्रेलिया और चीन समेत कई देशों से बातचीत कर रहा है, लेकिन हम से नहीं। उन्होंने दावा किया कि इसी कारण हमारे पास देश का नक्शा प्रकाशित करने के अलावा कोई विकल्प नहीं था।

नेपाली विदेश मंत्री का भारत पर निशाना
उन्होंने दावा किया कि जब भारत ने नवंबर 2019 में अपने राजनीतिक मानचित्र के 8 वें संस्करण को प्रकाशित किया, तो इसमें नेपाल का कालापानी, लिपुलेख और लिंपियाधुरा का क्षेत्र शामिल था। निश्चित रूप से नेपाल ने राजनीतिक बयानों और राजनयिक नोटों के माध्यम से इसका विरोध किया। उस समय हमने अपने भारतीय दोस्तों को औपचारिक रूप से इन समस्याओं को सुलझाने के लिए कूटनीतिक बातचीत शुरू करने के लिए कहा। हमने संभावित तारीखों का भी प्रस्ताव रखा लेकिन हमारे प्रस्ताव का समय पर जवाब नहीं दिया गया।

चीन पर भी नेपाल ने दिया ‘ज्ञान’
नेपाल के विदेश मंत्री प्रदीप ज्ञावली ने कहा कि चीन और भारत का उदय साथ-साथ कैसे जुड़ते हैं, उनकी साझेदारी कैसे आगे बढ़ेगी और कैसे वे अपने मतभेदों को दूर करेंगे। इससे निश्चित रूप से एशिया या कम से कम इस क्षेत्र का भविष्य निश्चित होगा। उन्होंने कहा कि वुहान समिट ने दोनों देशों के बीच साझेदारी को गहरा किया लेकिन गलवान घाटी में संघर्ष के बाद तनाव बना हुआ है। दोनों देश तनाव दूर करने की कोशिश कर रहे हैं, हालांकि यह मुश्किल है।

नए नक्शे में भारतीय जमीन को नेपाल ने बताया अपना
दोनों देशों के सीमा गतिरोध के बीच विवादित नक्शे में भारत के लिपुलेख, कालापानी और लिम्पियाधुरा को नेपाल ने अपने क्षेत्र में दिखाया है। इस नक्शे को नेपाली संसद ने मंजूरी भी दे दी है। जिसके बाद यह नक्शा वहां के संविधान का हिस्सा बन गया है। वहीं, भारत ने भी इस नक्शे को लेकर विरोध के लिए नेपाल को डिप्लोमेटिक नोट भेजा था।

नेपाल में सत्‍ता में वामपंथी, चीन से बढ़ाई नजदीकी
नेपाल में इन दिनों राजनीति में वामपंथियों का दबदबा है। वर्तमान प्रधानमंत्री केपी शर्मा भी वामपंथी हैं और नेपाल में संविधान को अपनाए जाने के बाद वर्ष 2015 में पहले प्रधानमंत्री बने थे। उन्‍हें नेपाल के वामपंथी दलों का समर्थन हासिल था। केपी शर्मा अपनी भारत विरोधी भावनाओं के लिए जाने जाते हैं। वर्ष 2015 में भारत के नाकेबंदी के बाद भी उन्‍होंने नेपाली संविधान में बदलाव नहीं किया और भारत के खिलाफ जवाबी कार्रवाई के लिए केपी शर्मा चीन की गोद में चले गए। नेपाल सरकार चीन के साथ एक डील कर ली। इसके तहत चीन ने अपने पोर्ट को इस्तेमाल करने की इजाज़त नेपाल को दे दी।

नेपाल में बड़े पैमाने पर चीन कर रहा निवेश
दरअसल, नेपाल एक जमीन से घिरा देश है और उसे लगा कि चीन की गोद में जाकर भारत की नाकेबंदी का तोड़ न‍िकाला जा सकता है। चीन ने थिंयान्जिन, शेंज़ेन, लिआनीयुगैंग और श्यांजियांग पोर्ट के इस्तेमाल की अनुमति दी है। आलम यह है कि अब नेपाल चीन के महत्‍वाकांक्षी बीआरआई प्रोग्राम में भी शाम‍िल हो गया। चीन नेपाल तक रेलवे लाइन बिछा रहा है। चीन बड़े पैमाने पर नेपाल में निवेश कर रहा है। ताजा विवाद के पीछे भी चीन पर आरोप लग रहा है। सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने संकेत दिए थे नेपाल के लिपुलेख मिद्दा उठाने के पीछे कोई विदेशी ताकत हो सकती है।

माओवादियों ने भारत का विरोध कर जीता चुनाव
भारतीय अधिकारी ने बताया कि नेपाल की सियासत पर इन दिनों माओवादी दलों का कब्‍जा है। वहां पुरानी पार्टी नेपाली कांग्रेस नेपथ्‍य में चली गई है और वाम दल पहाड़ी लोगों में भारत के खिलाफ दुष्‍प्रचार करने में लगे हुए हैं। पीएम केपी शर्मा ओली ने भी पिछले चुनाव में भारत के खिलाफ जमकर बयानबाजी की थी। उन्‍होंने भारत का डर दिखाकर पहाड़‍ियों और अल्‍पसंख्‍यकों को एकजुट किया और सत्‍ता हास‍िल कर ली। मंगलवार को केपी शर्मा ओली ने संसद में भारतीय सेना प्रमुख पर भी निशाना था। ओली ने कहा कि कालापानी, लिंपियाधुरा और लिपुलेख हमारा है और हम उसे वापस लेकर रहेंगे।

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